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Monday, July 13, 2009

खुशी

सुखबीर को अपने इकलौते बेटे अमन से बड़ा लगाव था। यों तो स्कूल की वैन-सर्विस थी, लेकिन सुबह उसे स्कूल छोड़ने व दोपहर छुट्टी के समय उसे घर लाने के लिए, वह स्वयं स्कूल जाता था। वह इसी में खुश और संतुष्ट था। आज भी तपती दोपहरी में वह स्कूटर पर उसे लेने गया। लू चल रही थी। अमन आया, तो मुरझाया-सा लग रहा था। सुखबीर ने रास्ते में स्कूटर रोककर उसे ठण्डी फ्रूटी पिलाई।
अमन फ्रूटी के पैक में स्ट्रा लगाए मजे से आम का रस ले रहा था। जल्द ही खुशी से उसका चेहरा खिल उठा।
देखकर सुखवीर भी खुश हुआ। पास से सरकारी स्कूल से लौटे दो बच्चे पैदल आ रहे थे। उनके गाल रूखे व होंठ सूखे हुए थे। अमन को दुकान की छाया में फ्रूटी पीते देखकर वे जरा ठिठके।
हसरत भरी नजरों से उसे देखते रहे। फिर सूखे होंठों पर जबान फेरते हुए आगे बढ़ गए। एक ने दूसरे से कहा- 'हमारी ऐसी किस्मत कहां!' दूसरे ने हामी भरते हुए कहा- 'ठीक कहते हो, भाई!' चलते-चलते उन्हे फ्रूटी का इस्तेमाल किया हुआ खाली पैक सड़क किनारे पड़ा दिखाई दिया। एक ने कसकर पैर से उसे ठोकर मारी। पैक हवा में लहराता हुआ एक नाली में जा गिरा। दोनों बच्चों ने जोर से ठहाका लगाया और खुशी-खुशी घर को चल दिए।

Tuesday, June 30, 2009

पेट की आग

आग.. आग.. आग.. का शोर सुनकर मेरी नींद खुल गई।
छत पर पहुँचा तो देखा कि पास-पड़ोस के लोग भी अपनी-अपनी छतों पर चढ़े सामने की झोपड़पट्टी में आग लगने से ऊंची-ऊंची उठती लपटे देख रहे थे। लोग वहां पर इधर-उधर भाग रहे थे। किसी के हाथ में बाल्टी थी तो कोई प्लास्टिक का डिब्बा ही पानी से भर-भरकर आग बुझाने की मशक्कत में जुटा था। इतने में फायर ब्रिगेड की कई गाड़ियां आ पहुंचीं और पानी की तेज बौछार आग की लपटों को शांत करने लगीं। एकाध घंटे बाद लपटों की जगह धुआं उठता दिख रहा था। हम सब सोने चल दिए।
समाचार पत्र में पेज नंबर तीन पर अग्निकांड को विस्तार से छापा गया था। गनीमत थी कि कोई मौत नहीं हुई थी। कुछ लोगों की गृहस्थी जल गई थी। अग्निपीड़ितों की मदद के लिए हाथों में खाने के कुछ पैकेट लेकर हम वहां गए तो देखा दो बच्चे वहां जले पड़े झोपड़े में एक जल गए बोरे में से कुछ भुने आलू छांट रहे थे। मन में एक ही सवाल कौंध रहा था-कौन-सी आग बड़ी थी, कल रात लगी आग या यह पेट की।