एक वोट दे दे, ओ देश के जमाईबाबू
एक वोट दे दे
सुशासन देंगे, कुशासन भगाएंगे
देंगे हम खुशहाल भारत,
ओ बाबू एक वोट दे दे
ओ प्यारी प्यारी मम्मी, एक वोट दे दे
ओ प्यारी न्यारी बहना, एक वोट दे दे
वोट है जन्मसिद्ध अधिकार आपका
इस अधिकार से क्यों वंचित रहना,
ओ बाबू, ओ मम्मी, ओ बहना एक वोट दे दे]
*****
अगर गीतकार आनंद बख्शी आज जीवित होते, तो शायद इसी तर्ज पर कोई गीत लिखते। दरअसल, इस गीत के साथ नेताओं की जो छवि यकायक उभरकर सामने आती है, उसमें उनका गेट-अप, बातचीत का अंदाज और इन सबको मिलाकर बना व्यक्तित्व शामिल होता है। जमाने के साथ बहुत कुछ बदला, न केवल वक्त के साथ नेताजी की वेश-भूषा का कॉन्सेप्ट बदला, बल्कि बदला उनका अंदाज भी।
आज वोट मांगने के तरीके में भी यह बदलाव खूब दिखाई दे रहा है। वोट मांगते वक्त कभी नेता हाथ जोड़ लेते हैं, तो कभी विनम्रता से एक ग्लास पानी की फरमाइश करते हैं। सच तो यह है कि आजादी के ठीक बाद नेताओं का अपनी सादगी व वोट मांगने की शैली पर बहुत जोर था। इसका एक कारण था उनका स्वाधीनता आंदोलन से निकल कर आना। दरअसल स्वदेशी आंदोलन की छाया उन पर बनी हुई थी। यह भी एक वजह थी कि खासकर उत्तर भारत के नेताओं के सिर पर गांधी टोपी उनकी पोशाक का धीरे-धीरे एक हिस्सा बन गई थी।
यह जानना भी दिलचस्प होगा कि नेताओं के वोट मांगने के अंदाज में बदलाव किस तरह आया? शुरू में उनका जनता से सीधा संपर्क था। कुछ शीर्ष नेताओं को छोड़, शेष प्रतिनिधि अपने क्षेत्र में घर-घर जाकर मतदाताओं से संपर्क करते थे। नुक्कड़ सभाओं की भी अहमियत होती थी। भोजपुरी इलाके में जब ये वोट मांगने जाते, तो वे वोटरों से कहते थे, 'तू हमरा के वोट देई, हम तोहरा के अच्छी सरकार देइब।' यह सही है कि तब भी इन्हें मतदाताओं की याद चुनाव के समय ही आती थी, पर फिर भी उन्हें अपने वोटरों की चिंता रहती थी।
आज राहुल गांधी द्वारा दलितों के घर में रात बिताने की घटनाएं देखकर बिहार के दिग्गज नेता कर्पूरी ठाकुर की याद आना स्वाभाविक है। कर्पूरी ठाकुर दातून मुंह में दबाकर किसी के घर जाते थे और वहीं कुल्ला कर कहते, 'कुछ खिलाओ'। यह कह कर वे रात किसी भी गरीब की झोपड़ी में बिता देते थे। जनता से सीधे संवाद का उनका यह तरीका निराला था। वे मैथिली में संवाद कुछ इस तरह से करते, 'अहां हमरा वोट दियो, हम नीक सरकार देब।' दरअसल, उनका यह निराला अंदाज इसलिए भी संभव हो पाता था, क्योंकि उनमें कोई अभिजात्य नहीं था। यह काम बाद के दलित नेता नहीं कर सके, क्योंकि उन्होंने पांच सितारा सुविधाओं से अपने को जोड़ लिया।
मंडल की राजनीति के बाद तो अनेक नेताओं का जनता से संपर्क बड़ी रैलियों में ही हो पाता था। जाति के आधार पर कई राज्यों में ध्रुवीकरण के चलते नेताओं ने मतदाता को बंधुआ मान लिया। लालू यादव सरीखे नेता जनता से सिर्फ पटना के गांधी मैदान में मुखातिब होते थे: रैली, रैला और महारैला के नाम पर। वे कहते थे, 'लालू को चाहिए आलू। आलू उगाओ, खूब खाओ और देश बचाओ।' बिहार में दलितों के नए नेता रामविलास पासवान वोटरों के संपर्क में तो रहते हैं, पर ज्यादातर अपने चुनाव क्षेत्र में। अन्य जगहों पर उन्हें लगता है कि उनका संदेश जाना भर काफी है। इंदिरा गांधी और बाद में राजीव गांधी की तरह चलते काफिले से हाथ हिलाकर जनता से संवाद कायम करना उन्हें अच्छा लगता है। कहीं-कहीं रुक कर हाथ जोड़कर मुस्करा देना उनकी समझ से काफी है।
वाकई, आज के इस दौर में वोट मांगने का तरीका बदल गया है। सब कुछ फिल्मी स्टाइल में होता है। वोट मांगते वक्त नेता कहते नहीं थकते कि हेन करेंगे, तेन करेंगे, फलां करेंगे, ढका करेंगे, लेकिन अंतत: वे जब गद्दी पर आसीन होते हैं तो फिर पांच साल के लिए अपने वायदों को भूल जाते हैं।
[पोशाक के साथ जुड़ी छवि]
पंडित जवाहर लाल नेहरू या अबुल कलाम आजाद जैसे नेताओं की बात छोड़ दें, तो उत्तर भारत में कांग्रेस, जनसंघ के नेता आम तौर पर धोती-कुरता या कुरता पाजामा में ही विश्वास करते थे। कुछ की छवि तो पोशाक के साथ ही जुड़ गई थी। पंडित नेहरू की कल्पना चुस्त पाजामे और शेरवानी के बिना नहीं की जा सकती थी, तो ऊंची कालर के कुरते और पाजामे के बिना जयप्रकाश नारायण की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कुछ इलाकों में आज भी इस तरह के कुरते को जयप्रकाश कट कहा जाता है। एक पूरी पीढ़ी ऐसी चली गई, जिसके लिए निजी और सार्वजनिक जीवन में पहरावा धौंस जमाने का औजार नहीं था, बल्कि एक शैली थी सात्विक व साधारण जीवन जीने की। इस पीढ़ी में मधु लिमये, जॉर्ज फर्नांडिस, कर्पूरी ठाकुर जैसे समाजवादी भी रहे, तो कमलापति त्रिपाठी, श्रीकृष्ण सिंह (बिहार के पहले मुख्यमंत्री), जैसे कांग्रेसी भी। जहां तक वेश-भूषा का सवाल है तो आमतौर पर दक्षिण के नेताओं ने आज भी लुंगी की पहचान बनाए रखी। दक्षिण के ये नेता वोट मांगते वक्त शालीनता से कहते हैं, 'ऐंग लेके वोट फोडंगल उंगलेके नल्य सरकार कोडुकीरोम' यानी तुम हमें वोट दो, हम तुम्हें अच्छी सरकार देंगे। इसके उलट सिनेमा से राजनीति में आए एमजी रामचंद्रन, एनटी रामाराव या कम्युनिस्टों के लिए नेताओं की परंपरागत ड्रेस का कोई खास अर्थ नहीं था। जहां एक ओर दक्षिण के भाकपा और माकपा के नेताओं को पैंट-शर्ट से परहेज नहीं था, वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल के मार्क्सवादियों के साथ धोती-कुरता का जुड़ा होना राजनीति की वजह से कम, उनकी संस्कृति की वजह से अधिक था। ज्योति बसु जब विदेश जाते थे, तो बंद गले के सूट में होते थे, पर जब बंगाल लौटते, तो अपने परंपरागत पहरावे में आ जाते थे। हालांकि अपने राज्य में भी उन्हें पैंट-कोट में देखा जा सकता था। दलित नेता कांशीराम सार्वजनिक मंचों पर हमेशा पैंट-शर्ट में ही रहते थे।
[हिट थी सर पे गाँधी टोपी]
आजादी के बाद लगभग दो दशक तक कांग्रेस के ज्यादातर नेता सार्वजनिक स्थानों पर टोपी के साथ ही दिखाई देते थे, यानी सर पे गांधी टोपी और दिल है हिंदुस्तानी। आश्चर्य की बात है कि आज यह टोपी नारायण दत्त तिवारी सरीखे इक्के-दुक्के नेताओं के ही सिर की शोभा बढ़ाती है। प्रतीकात्मक तौर पर राहुल गांधी जैसे नौजवान इसे पहनकर किसी झोपड़ी का रुख करें और वहां हाथ जोड़ कर विनम्रता से कहें कि 'आपका वोट ही है-आपका अधिकार', तो वह अलग बात है।
[वक्त-वक्त पर उछले नारे]
बांग्लादेश के युद्ध के बाद कांग्रेसियों का नारा था, 'इंडिया इज इंदिरा एंड इंदिरा इज इंडिया।' इसी दौरान इंदिरा गांधी ने 'गरीबी हटाओ' नारा देकर देश की जनता को इमोशनली बांध दिया। मजे की बात तो यह है कि खुद अटल जी ने उन्हें दुर्गा की उपाधि दी। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में अटल जी एक नए नारे के साथ आए, 'चौथी बारी, अटल बिहारी'। इसी प्रकार विश्वनाथ प्रताप सिंह को लेकर उछला नारा था, 'राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है।'
'दुश्मन न करे, दोस्त ने वो काम किया है' इस नारे के साथ ममता बनर्जी बंगाल में टूट पड़ती थीं कम्युनिस्टों पर। बांग्ला भाषा में इसे इस तरह से गाया जाता था, 'शत्रु ना कारुक, मित्रेरा तो ऐई काज करेछे, जेनेसुने आमादेर बदनाम करेछे।'
इन दिनों कुछ युवा लोग यह नारा भी लगा रहे हैं, 'तुम्हारी भी जय जय, हमारी भी जय जय।' दूसरी ओर, कुछ कांग्रेसी कह रहे हैं, 'स्थायी सरकार, विकास का आधार'। कुछ नेताओं ने यह नारा लगाना शुरू कर दिया है, 'बाकी जो बचा था, महंगाई मार गई'।
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Friday, April 24, 2009
सांसद की दौड़ में मात्र एक दर्जन युवा
देश का भविष्य युवाओं के हाथ में हैं। इस कारण चुनाव आते ही राजनीतिक दल या चुनाव आयोग, सबकी कोशिश होती है कि युवाओं को सबसे ज्यादा चुनाव के प्रति आकर्षित किया जाए। लेकिन दिल्ली की सात लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए जो प्रत्याशी मैदान में उतरे हैं, उनमें युवाओं की संख्या एक तिहाई से भी कम है। नामांकन प्रक्रिया समाप्त होने के बाद सभी सात सीटों से कुल 217 प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। इनमें हजारी से लेकर करोड़पति व चाय विक्रेता, ऑटो वाली से नामीगिरामी उद्यमी तक शामिल हैं। लेकिन बता दें कि महज 12 प्रत्याशी ऐसे हैं जिनकी आयु 25 से 30 वर्ष के बीच है। 30 से 40 वर्ष की आयु वर्ग के प्रत्याशियों की संख्या 61 है, जबकि छह प्रत्याशी 70 साल की दहलीज को पार कर चुके हैं।
दो रोटी को तरसते थे, अब मिल रहा भरपेट खाना
'बेटा पहले तो दो जून की रोटी जुटा पाना मुश्किल हो रहा था लेकिन अब भरपेट भोजन मिल रहा है। भगवान करे चुनाव बार-बार आए ताकि उन्हें भूखे नहीं सोना पड़े।' एक चुनावी कार्यालय से बाहर निकले 60 वर्षीय दुलीचंद ने यही कहा। दुलीचंद ही क्या सैकड़ों लोग ऐसे हैं जो प्रत्याशियों को आशीर्वाद देते नहीं थक रहे हैं। इसकी वजह है चुनावी कार्यालय में चल रहे लंगर। चुनाव नजदीक आते ही निम्न श्रेणी के लोगों की मौज आ गई। पहले जहां दो रोटी के लिए मशक्कत करना पड़ता था, अब चुनावी कार्यालयों भरपेट खाना मिल रहा है।
उत्तर पूर्वी सीट में कांग्रेस, भाजपा, बसपा आदि पार्टियों के प्रत्याशियों के चुनावी कार्यालय काफी बड़े हैं। इनमें सैकड़ों लोगों के बैठने की व्यवस्था है। कार्यकर्ताओं को किसी तरह की कमी न हो, इसका प्रत्याशियों ने बखूबी ख्याल रखा है। कार्यालयों में सुबह के नाश्ते से लेकर रात्रि भोज तक की उत्तम व्यवस्था है। यहां दिन भर लंगर चलते हैं। कार्यकर्ताओं के साथ भीड़ बढ़ाने आए लोगों को भी भोजन मिल रहा है। सीमापुरी, नंद नगरी, वेलकम, मुस्तफाबाद, शास्त्री पार्क आदि इलाकों में रहने वाले निम्न श्रेणी के लोग भी इसका फायदा उठा रहे हैं। कुछ घंटे प्रत्याशी की जयकार लगाने के एवज में उन्हें अच्छा खाना मिल रहा है। कभी दाल-चावल तो कभी कढ़ी व पनीर जैसे व्यंजन खाने के लिए लोग चुनावी कार्यालय तक पहुंच रहे हैं। हालांकि इससे प्रत्याशियों को वोट देने वालों में कितना इजाफा होगा ये मतगणना के बाद ही पता चल पाएगा, लेकिन खाना मिलने के कारण प्रत्याशियों के कार्यालयों में हमेशा भीड़ लगी रहती है।
उत्तर पूर्वी सीट में कांग्रेस, भाजपा, बसपा आदि पार्टियों के प्रत्याशियों के चुनावी कार्यालय काफी बड़े हैं। इनमें सैकड़ों लोगों के बैठने की व्यवस्था है। कार्यकर्ताओं को किसी तरह की कमी न हो, इसका प्रत्याशियों ने बखूबी ख्याल रखा है। कार्यालयों में सुबह के नाश्ते से लेकर रात्रि भोज तक की उत्तम व्यवस्था है। यहां दिन भर लंगर चलते हैं। कार्यकर्ताओं के साथ भीड़ बढ़ाने आए लोगों को भी भोजन मिल रहा है। सीमापुरी, नंद नगरी, वेलकम, मुस्तफाबाद, शास्त्री पार्क आदि इलाकों में रहने वाले निम्न श्रेणी के लोग भी इसका फायदा उठा रहे हैं। कुछ घंटे प्रत्याशी की जयकार लगाने के एवज में उन्हें अच्छा खाना मिल रहा है। कभी दाल-चावल तो कभी कढ़ी व पनीर जैसे व्यंजन खाने के लिए लोग चुनावी कार्यालय तक पहुंच रहे हैं। हालांकि इससे प्रत्याशियों को वोट देने वालों में कितना इजाफा होगा ये मतगणना के बाद ही पता चल पाएगा, लेकिन खाना मिलने के कारण प्रत्याशियों के कार्यालयों में हमेशा भीड़ लगी रहती है।
Thursday, April 16, 2009
डालते है वे आचार संहिता का अचार
आजकल जनप्रतिनिधियों के बारह बजे हैं। वे हलकान हैं। चुनाव के मौसम में पचास लफड़े हैं। एक तो टिकट जुगाड़ने में ही फिचकुर निकल जाता है, इसके बाद प्रचार की मारामारी। जनता के बीच जाओ। वोट मागो। सबको भरमाओ। शेखचिल्ली की तरह सपने देखो और दिखाओ।
चुनाव अब पहले की तरह आसान नहीं रहे। जनता नेता को जोकरों की तरह झुलाती है। उसके मनोरंजन के लिये जनप्रतिनिधि को कभी 'गजनी' जैसा बनकर दिखाना पड़ता है, कभी 'सजनी' जैसा। शक्ति प्रदर्शन, गाली-गलौज की तो कोई बात ही नहीं, चलता ही रहता है। इधर एक नई आफत आ गयी है, 'चुनाव आचार संहिता' की। पहले तो जनप्रतिनिधि समझते रहे होंगे कि आचार संहिता अचार जैसी कोई चटखारेदार चीज होती होगी, लेकिन जब लगी तो मिर्ची जैसी लगी। जिसको लगती है पानी मागने लगता है।
जनप्रतिनिधि बेचारा कुछ भी करता है, करने के बाद पता चलता है कि यह काम तो आचार संहिता के खिलाफ था। पैसा बाटो तो आफत, गाली दो तो आफत, धमकाओ तो आफत, दूसरे धर्म की निन्दा करो तो आफत, गुंडे लगाओ तो आफत, बूथ कैप्चर करो तो आफत, राहत कार्य करो तो आफत। मतलब चुनाव जीतना का कोई काम करो तो आफत। जनप्रतिनिधि को खुल के खेलने ही नहीं दिया जाता, कैसे लड़े वो चुनाव!
चुनाव आयोग जनता और नेता के मिलन में दीवार की तरह खड़ा हो जाता है। अब बताओ, कहता है कि चुनाव में पैसा न बाटो! आजकल कहीं उधारी में काम चलता है? लोग कहते भी हैं, उधार प्रेम की कैंची है। जो एडवास पेमेंट देगा, सामान तो उसी का होगा न!
चुनाव आयोग और जनप्रतिनिधि के बीच वैचारिक मतभेद भी एक लफड़ा है। चुनाव आयोग मानता है कि जो जनप्रतिनिधि चुनाव जीते बिना ही गड़बड़ तरीके अपनाता है, वो चुनाव जीतने के बाद और गड़बड़ करेगा। वहीं जनप्रतिनिधि मानता है कि जनता समझती होगी कि जो जनप्रतिनिधि चुनाव के पहले हमारे लिये पैसा खर्चा नहीं कर सकता, वो बाद में क्या करेगा?
अब जनप्रतिनिधि बहुत हलकान हैं। उनका भाषण लिखने वाले ही उनको नहीं मिल रहे। ऐसे में अगर कोई जनप्रतिनिधि चुनाव आयोग की नजरों में फंस जाये तो क्या कर सकता है? एक बार फंसने के बाद उसके करने के लिये कुछ बचता तो है नहीं, जो करना होता है वह तो चुनाव आयोग को करना है, लेकिन फिर भी ऐसी स्थिति में बचने के लिये कुछ लचर बहाने यहा पेश किये जा रहे हैं, जो जनप्रतिनिधि अपने हिसाब से चुनाव आयोग के सामने पेश कर सकता है-
* हम वोटरों को शिक्षित कर रहे थे। उनके वोट की कीमत समझा रहे थे। वो मान ही नहीं रहे थे कि उनके वोट की कोई कीमत भी होती है। हमने बताया कि वोट की कीमत ये होती है। ये तो बयाना है। बाकी बाद में मिलेगा। साहब, हम तो जनता को जागरूक कर रहे थे। उनके अधिकार के महत्व के बारे में बता रहे थे।
* चुनाव सभा में ऐसे ही एक वोटर ने पूछा कि बेलआउट पैकेज क्या होता है? हमने अमेरिका का उदाहरण देकर समझाया कि दीवालिया कम्पनियों को अमेरिकन सरकार जो पैसा देती है उसे बेलआउट पैकेज कहते हैं। वोटर ने जिद की कि उदाहरण देकर समझाओ, तो हमको 'उदाहरण' देकर समझाना पड़ा। अब जनता को जागरूक करना कैसे आचार संहिता के खिलाफ हो गया, हमें तो कुछ समझ में नहीं आता?
* हम भड़काऊ और धमकाऊ भाषण नहीं दे रहे थे। हम तो जनता को समझा रहे थे कि दूसरे धमरें के खिलाफ उल्टी-सीधी बातें नहीं बोलनी चाहिये जिससे वैमनस्य फैले। जनता कहने लगी कि उदाहरण देकर समझाओ कि भड़काऊ भाषण क्या होता है, कैसे देते हैं? जनता की जानकारी के लिये मुझे मन मारकर समझाना पड़ा। अब जनता को वैमनस्य से दूर रखने के लिये उसको समझाना भी अगर आप गुनाह समझते हैं, तो हम क्या कर सकते हैं?
* नयी परियोजना का उद्घाटन करने की हमको कोई जल्दी नहीं थी। जहा दस साल लटकी रही, वहा दस साल और लटक जाती, लेकिन हमें भारतीय संस्कृति ने परेशान कर दिया। हमारे दिमाग में बार-बार कैसेट बजने लगा, 'काल्ह करे सो आज कर।' सो हमने दिल पर पत्थर रखकर पत्थर लगवा दिया। अब संस्कृति का पालन भी गुनाह हो गया क्या?
* हम असल में जनता से कभी मिल पाते नहीं। पाच साल देश की समस्याओं में उलझे रहते हैं। जब मिले तो मन के भाव उमड़ पड़े और मन किया कि सब हिसाब-किताब अभी कर दिया जाए। जैसे फिल्मों में बिछड़े भाई मिलते हैं, तो न जाने क्या-क्या करते बोलते हैं, वैसे ही हमें होश ही नहीं रहा कि हमने क्या किया और क्या हो गया। अब अगर भाई-भाई के बीच में लेन-देन को भी आप आचार संहिता का उल्लंघन मानेंगे तो देश का सारा सद्भाव ही गड़बड़ा जायेगा।
बहाने और भी हैं, लेकिन उनको बताने में दफ्तर की आचार संहिता का उल्लंघन हो सकता है, जहा कोई बहाना नहीं चलता। इसलिये फिलहाल इत्ते से ही संतोष करें!
चुनाव अब पहले की तरह आसान नहीं रहे। जनता नेता को जोकरों की तरह झुलाती है। उसके मनोरंजन के लिये जनप्रतिनिधि को कभी 'गजनी' जैसा बनकर दिखाना पड़ता है, कभी 'सजनी' जैसा। शक्ति प्रदर्शन, गाली-गलौज की तो कोई बात ही नहीं, चलता ही रहता है। इधर एक नई आफत आ गयी है, 'चुनाव आचार संहिता' की। पहले तो जनप्रतिनिधि समझते रहे होंगे कि आचार संहिता अचार जैसी कोई चटखारेदार चीज होती होगी, लेकिन जब लगी तो मिर्ची जैसी लगी। जिसको लगती है पानी मागने लगता है।
जनप्रतिनिधि बेचारा कुछ भी करता है, करने के बाद पता चलता है कि यह काम तो आचार संहिता के खिलाफ था। पैसा बाटो तो आफत, गाली दो तो आफत, धमकाओ तो आफत, दूसरे धर्म की निन्दा करो तो आफत, गुंडे लगाओ तो आफत, बूथ कैप्चर करो तो आफत, राहत कार्य करो तो आफत। मतलब चुनाव जीतना का कोई काम करो तो आफत। जनप्रतिनिधि को खुल के खेलने ही नहीं दिया जाता, कैसे लड़े वो चुनाव!
चुनाव आयोग जनता और नेता के मिलन में दीवार की तरह खड़ा हो जाता है। अब बताओ, कहता है कि चुनाव में पैसा न बाटो! आजकल कहीं उधारी में काम चलता है? लोग कहते भी हैं, उधार प्रेम की कैंची है। जो एडवास पेमेंट देगा, सामान तो उसी का होगा न!
चुनाव आयोग और जनप्रतिनिधि के बीच वैचारिक मतभेद भी एक लफड़ा है। चुनाव आयोग मानता है कि जो जनप्रतिनिधि चुनाव जीते बिना ही गड़बड़ तरीके अपनाता है, वो चुनाव जीतने के बाद और गड़बड़ करेगा। वहीं जनप्रतिनिधि मानता है कि जनता समझती होगी कि जो जनप्रतिनिधि चुनाव के पहले हमारे लिये पैसा खर्चा नहीं कर सकता, वो बाद में क्या करेगा?
अब जनप्रतिनिधि बहुत हलकान हैं। उनका भाषण लिखने वाले ही उनको नहीं मिल रहे। ऐसे में अगर कोई जनप्रतिनिधि चुनाव आयोग की नजरों में फंस जाये तो क्या कर सकता है? एक बार फंसने के बाद उसके करने के लिये कुछ बचता तो है नहीं, जो करना होता है वह तो चुनाव आयोग को करना है, लेकिन फिर भी ऐसी स्थिति में बचने के लिये कुछ लचर बहाने यहा पेश किये जा रहे हैं, जो जनप्रतिनिधि अपने हिसाब से चुनाव आयोग के सामने पेश कर सकता है-
* हम वोटरों को शिक्षित कर रहे थे। उनके वोट की कीमत समझा रहे थे। वो मान ही नहीं रहे थे कि उनके वोट की कोई कीमत भी होती है। हमने बताया कि वोट की कीमत ये होती है। ये तो बयाना है। बाकी बाद में मिलेगा। साहब, हम तो जनता को जागरूक कर रहे थे। उनके अधिकार के महत्व के बारे में बता रहे थे।
* चुनाव सभा में ऐसे ही एक वोटर ने पूछा कि बेलआउट पैकेज क्या होता है? हमने अमेरिका का उदाहरण देकर समझाया कि दीवालिया कम्पनियों को अमेरिकन सरकार जो पैसा देती है उसे बेलआउट पैकेज कहते हैं। वोटर ने जिद की कि उदाहरण देकर समझाओ, तो हमको 'उदाहरण' देकर समझाना पड़ा। अब जनता को जागरूक करना कैसे आचार संहिता के खिलाफ हो गया, हमें तो कुछ समझ में नहीं आता?
* हम भड़काऊ और धमकाऊ भाषण नहीं दे रहे थे। हम तो जनता को समझा रहे थे कि दूसरे धमरें के खिलाफ उल्टी-सीधी बातें नहीं बोलनी चाहिये जिससे वैमनस्य फैले। जनता कहने लगी कि उदाहरण देकर समझाओ कि भड़काऊ भाषण क्या होता है, कैसे देते हैं? जनता की जानकारी के लिये मुझे मन मारकर समझाना पड़ा। अब जनता को वैमनस्य से दूर रखने के लिये उसको समझाना भी अगर आप गुनाह समझते हैं, तो हम क्या कर सकते हैं?
* नयी परियोजना का उद्घाटन करने की हमको कोई जल्दी नहीं थी। जहा दस साल लटकी रही, वहा दस साल और लटक जाती, लेकिन हमें भारतीय संस्कृति ने परेशान कर दिया। हमारे दिमाग में बार-बार कैसेट बजने लगा, 'काल्ह करे सो आज कर।' सो हमने दिल पर पत्थर रखकर पत्थर लगवा दिया। अब संस्कृति का पालन भी गुनाह हो गया क्या?
* हम असल में जनता से कभी मिल पाते नहीं। पाच साल देश की समस्याओं में उलझे रहते हैं। जब मिले तो मन के भाव उमड़ पड़े और मन किया कि सब हिसाब-किताब अभी कर दिया जाए। जैसे फिल्मों में बिछड़े भाई मिलते हैं, तो न जाने क्या-क्या करते बोलते हैं, वैसे ही हमें होश ही नहीं रहा कि हमने क्या किया और क्या हो गया। अब अगर भाई-भाई के बीच में लेन-देन को भी आप आचार संहिता का उल्लंघन मानेंगे तो देश का सारा सद्भाव ही गड़बड़ा जायेगा।
बहाने और भी हैं, लेकिन उनको बताने में दफ्तर की आचार संहिता का उल्लंघन हो सकता है, जहा कोई बहाना नहीं चलता। इसलिये फिलहाल इत्ते से ही संतोष करें!
हम भी हैं राजनीति के चतुर खिलाड़ी
चुनाव का दंगल जारी है। कौन सी पार्टी ज्वाइन की जाए या कब बगावत के तेवर बुलंद किये जाएं, जिससे चुनावी महाभारत को जीता जा सके! हमारी महिला नेत्रियों के दिलोदिमाग में इस वक्त यही विचार सवार है। वे कोई चूक नहीं करना चाहतीं और हर वो पैंतरा आजमाने के लिए कमर कस चुकी हैं, जिन पर कल तक केवल पुरुष नेताओं का एकाधिकार माना जाता था। राजनीति के किसी भी दांव से महिला नेत्रियों को अब कोई परहेज नहीं और उनकी मंजिल बस एक है लोकसभा में पहुंचना।
[सुषमा स्वराज]
पेशे से वकील सुषमा स्वराज ने अपने पॉलिटिकल करियर की शुरु आत 1970 में एक छात्र नेता के रूप में की थी। इस दौरान वह इंदिरा गांधी के खिलाफ चलाए जाने वाले आंदोलनों का नेतृत्व किया करती थीं। वह 1977 में जनता दल में शामिल हुई। हरियाणा विधानसभा चुनाव जीतकर वह देवीलाल की सरकार में मंत्री भी बनीं। हालांकि उन्हें जनता दल रास नहीं आया और दल बदलकर वह बीजेपी में शामिल हो गई। शायद आपको पता नहीं होगा कि सुषमा स्वराज को हरियाणा राज्य के सबसे बेहतर स्पीकर का खिताब भी मिल चुका है? कभी-कभी सुषमा अपनी बातों से मीडिया के लिए मसाला भी तैयार कर देती हैं। 2004 में जब सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की बात सामने आई, तो सुषमा ने एक ऐलान कर डाला। उन्होंने कहा कि यदि कोई विदेशी महिला भारत की प्रधानमंत्री बनती है, तो वह न केवल अपना सिर मुंडा लेंगी, बल्कि सफेद साड़ी भी पहनना शुरू कर देंगी। इसके अलावा, वह भोजन में सिर्फ मूंगफली लेंगी। भला हो कि मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री की गद्दी संभाली और सुषमा स्वराज सिर मुंडाने से बच गई!
[उमा भारती]
छोटी उम्र से ही रामायण की चौपाइयों और महाभारत के श्लोकों को धारा-प्रवाह बोलने वाली उमा रागिनी भारती 1984 में पहली बार बीजेपी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ीं। अयोध्या रामजन्म भूमि आंदोलन के समय उमा का सिग्नेचर स्लोगन था- राम-लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। नवंबर 2004 में बड़बोली उमा ने कैमरे के सामने लालकृष्ण आडवाणी को खूब भला-बुरा कहा और पार्टी से निकाल दी गई। वैसे, संघ की सहायता से वे दोबारा 2005 में पार्टी में आ गई। लेकिन शिवराज सिंह चौहान को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने पर नाराज उमा ने बीजेपी को फिर छोड़ दिया और अपनी नई पार्टी भारतीय जनशक्ति पार्टी बना ली। आजकल उमा आडवाणी को अपना पिता समान बता रही हैं। तो क्या उमा अब दल-बदल करेंगी?
[मेनका गांधी]
पत्रकार मेनका गांधी ने सूर्या पत्रिका में इंदिरा गांधी की सरकार के एक मंत्री के बेटे की सनसनीखेज तस्वीर छापकर खूब सुर्खियां बटोरीं। मेनका ने सन् 1983 में राजनीति में अपनी पहचान बनाने के लिए 'संजय विचार मंच पार्टी' बनाई। हालांकि बाद में उन्होंने अपनी पार्टी को मजबूती देने का विचार त्याग दिया और वह 1988 मे जनता दल में शामिल हो गई। जानवरों के हितों की रक्षा के लिए सदा आगे रहने वाली मेनका ने 1996 और 98 में निर्दलीय चुनाव भी लड़ा। इस समय मेनका को एक अदद पार्टी की तलाश थी, जिसकी वजह से 2004 में उन्होंने बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा।
[रेणुका चौधरी]
कांग्रेस सरकार में महिला और बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी गार्डेनिंग और लाइट म्यूजिक की शौकीन हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत तेलुगु देशम पार्टी से की। दरअसल 1998 में उनकी राज्यसभा की सदस्यता समय सीमा समाप्त हो गई थी। तेदेपा ने दोबारा उन्हें अपना उम्मीदवार नहीं बनाया। इस बात से रेणुका न केवल खफा हो गई, बल्कि इसका सारा दोष तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के सिर मढ़ दिया। और तो और वे कूद कर कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गई। विवादों में रहना रेणुका को खूब भाता है। पुरुष नेताओं की तरह पब्लिसिटी स्टंट में भी वह पीछे नहीं हैं। रेणुका हाल ही में आंध्रप्रदेश के अपने संसदीय क्षेत्र खम्मम में ट्रैक्टर चलाकर पहुंच गई, तो सब देखते ही रह गए। इस राजनीतिक नाटक को ज्यादा असरदार बनाने के लिए उन्होंने अपने साथ मुख्यमंत्री वाई.एस. राजशेखर रेड्डी को भी ट्रैक्टर पर बिठाया।
[रंजना बाजपेई]
उत्तरप्रदेश में महिला कांग्रेस की अध्यक्षता कर चुकीं रंजना सन् 2002 में समाजवादी पार्टी में शामिल हो गई। कारण, उन्हें उस समय लोहिया के आदर्शो पर चलना था। हालांकि 2009 के लोकसभा चुनाव के समय उन्हें बाबा साहब अंबेडकर के सिद्धांत भाने लगे। इसलिए वह अब बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो चुकी हैं। रंजना बाजपेई एक समय इंदिरा गांधी की बेहद करीबी रही है। वह पूर्व केंद्रीय मंत्री राजेंद्र कुमारी बाजपेई की पुत्रवधू हैं।
[ममता बनर्जी]
ममता बनर्जी ने 1970 में कांग्रेस पार्टी के साथ अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की। 1997 में उन्होंने न केवल कांग्रेस पार्टी को छोड़ दिया, बल्कि एक नई पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस भी बना ली। पार्टी छोड़ने की वजह वह पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और वामदलों में साठ-गांठ मानती हैं। ममता बनर्जी ने अपने अब तक के लोकसभा कार्यकाल के दौरान काफी कुछ ऐसा किया, जिससे वह काफी चर्चित हुई। उन्होंने 1996 में लोकसभा कार्यकाल के दौरान समाजवादी पार्टी सांसद अमर सिंह का कॉलर पकड़ लिया था। वहीं वर्ष 1997 में रेलवे बजट के दौरान रेल मंत्री रामविलास पासवान के ऊपर अपना शॉल फेंक दिया था। कारण, उनके अनुसार रामविलास ने पश्चिम बंगाल की पूरी तरह अनदेखी की। इसके अलावा, 1998 में वूमन रिजर्वेशन बिल का विरोध करने पर वे सपा सांसद दरोगा प्रसाद सरोज का कॉलर खींचती हुई संसद से बाहर ले गई। हाल ही में ममता ने कांग्रेस पार्टी के साथ चुनावी तालमेल किया है।
[नजमा हेपतुल्ला]
मौलाना अबुल कलाम आजाद ने भले ही देश के लिए पार्टी बदलना यानी मुस्लिम लीग में शामिल होना सही नहीं माना, लेकिन उनके परिवार की सदस्य नजमा हेपतुल्ला ने अपना रास्ता बनाने के लिए कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थामने में बिल्कुल परहेज नहीं किया। वर्ष 1973 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। 1980 में वे न केवल कांगेस पार्टी की सहायता से राज्यसभा सदस्य बनीं, बल्कि 1986 में इस पार्टी की महासचिव भी बन गई। वे 1985-1986 और फिर 1988 से लगातार 2004 तक राज्यसभा की उपसभापति बनी रहीं। फिर अचानक 2004 में नजमा कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गयीं। अपने इस कदम के लिए नजमा ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को जिम्मेदार ठहराया। नजमा के अनुसार, उन्होंने कांग्रेस पार्टी के लिए बहुत-कुछ किया, लेकिन सोनिया गांधी ने इन सभी बातों को नजरअंदाज कर दिया। इसलिए वे बीजेपी में शामिल हो गई।
[जयाप्रदा]
जयाप्रदा का असली नाम ललिता रानी है। उनका जन्म आंध्रप्रदेश के राजामुंदरी में हुआ था। वह डॉक्टर बनना चाहती थीं। एक बार वह स्कूल फंक्शन के दौरान डांस कर रही थीं। उस समय उनकी उम्र मात्र चौदह वर्ष थी। उनके बेहतरीन डांस को देखकर एक तेलुगु फिल्म निर्माता ने उन्हें अपनी फिल्म में एक गाने में तीन मिनट का रोल दे दिया। फिल्मों में अपनी अदाओं से दर्शकों को लुभाने वाली जयाप्रदा ने 1994 में अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत तेलुगु देशम पार्टी से की। कुछ ही वर्षो बाद उनके और पार्टी सुप्रीमो चंद्रबाबू नायडू के रिश्तों में खटास आ गई। इसलिए वह दल-बदलकर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गई।
[सुषमा स्वराज]
पेशे से वकील सुषमा स्वराज ने अपने पॉलिटिकल करियर की शुरु आत 1970 में एक छात्र नेता के रूप में की थी। इस दौरान वह इंदिरा गांधी के खिलाफ चलाए जाने वाले आंदोलनों का नेतृत्व किया करती थीं। वह 1977 में जनता दल में शामिल हुई। हरियाणा विधानसभा चुनाव जीतकर वह देवीलाल की सरकार में मंत्री भी बनीं। हालांकि उन्हें जनता दल रास नहीं आया और दल बदलकर वह बीजेपी में शामिल हो गई। शायद आपको पता नहीं होगा कि सुषमा स्वराज को हरियाणा राज्य के सबसे बेहतर स्पीकर का खिताब भी मिल चुका है? कभी-कभी सुषमा अपनी बातों से मीडिया के लिए मसाला भी तैयार कर देती हैं। 2004 में जब सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने की बात सामने आई, तो सुषमा ने एक ऐलान कर डाला। उन्होंने कहा कि यदि कोई विदेशी महिला भारत की प्रधानमंत्री बनती है, तो वह न केवल अपना सिर मुंडा लेंगी, बल्कि सफेद साड़ी भी पहनना शुरू कर देंगी। इसके अलावा, वह भोजन में सिर्फ मूंगफली लेंगी। भला हो कि मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री की गद्दी संभाली और सुषमा स्वराज सिर मुंडाने से बच गई!
[उमा भारती]
छोटी उम्र से ही रामायण की चौपाइयों और महाभारत के श्लोकों को धारा-प्रवाह बोलने वाली उमा रागिनी भारती 1984 में पहली बार बीजेपी के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़ीं। अयोध्या रामजन्म भूमि आंदोलन के समय उमा का सिग्नेचर स्लोगन था- राम-लला हम आएंगे, मंदिर वहीं बनाएंगे। नवंबर 2004 में बड़बोली उमा ने कैमरे के सामने लालकृष्ण आडवाणी को खूब भला-बुरा कहा और पार्टी से निकाल दी गई। वैसे, संघ की सहायता से वे दोबारा 2005 में पार्टी में आ गई। लेकिन शिवराज सिंह चौहान को मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाने पर नाराज उमा ने बीजेपी को फिर छोड़ दिया और अपनी नई पार्टी भारतीय जनशक्ति पार्टी बना ली। आजकल उमा आडवाणी को अपना पिता समान बता रही हैं। तो क्या उमा अब दल-बदल करेंगी?
[मेनका गांधी]
पत्रकार मेनका गांधी ने सूर्या पत्रिका में इंदिरा गांधी की सरकार के एक मंत्री के बेटे की सनसनीखेज तस्वीर छापकर खूब सुर्खियां बटोरीं। मेनका ने सन् 1983 में राजनीति में अपनी पहचान बनाने के लिए 'संजय विचार मंच पार्टी' बनाई। हालांकि बाद में उन्होंने अपनी पार्टी को मजबूती देने का विचार त्याग दिया और वह 1988 मे जनता दल में शामिल हो गई। जानवरों के हितों की रक्षा के लिए सदा आगे रहने वाली मेनका ने 1996 और 98 में निर्दलीय चुनाव भी लड़ा। इस समय मेनका को एक अदद पार्टी की तलाश थी, जिसकी वजह से 2004 में उन्होंने बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ा।
[रेणुका चौधरी]
कांग्रेस सरकार में महिला और बाल विकास मंत्री रेणुका चौधरी गार्डेनिंग और लाइट म्यूजिक की शौकीन हैं। उन्होंने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत तेलुगु देशम पार्टी से की। दरअसल 1998 में उनकी राज्यसभा की सदस्यता समय सीमा समाप्त हो गई थी। तेदेपा ने दोबारा उन्हें अपना उम्मीदवार नहीं बनाया। इस बात से रेणुका न केवल खफा हो गई, बल्कि इसका सारा दोष तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के सिर मढ़ दिया। और तो और वे कूद कर कांग्रेस पार्टी में शामिल हो गई। विवादों में रहना रेणुका को खूब भाता है। पुरुष नेताओं की तरह पब्लिसिटी स्टंट में भी वह पीछे नहीं हैं। रेणुका हाल ही में आंध्रप्रदेश के अपने संसदीय क्षेत्र खम्मम में ट्रैक्टर चलाकर पहुंच गई, तो सब देखते ही रह गए। इस राजनीतिक नाटक को ज्यादा असरदार बनाने के लिए उन्होंने अपने साथ मुख्यमंत्री वाई.एस. राजशेखर रेड्डी को भी ट्रैक्टर पर बिठाया।
[रंजना बाजपेई]
उत्तरप्रदेश में महिला कांग्रेस की अध्यक्षता कर चुकीं रंजना सन् 2002 में समाजवादी पार्टी में शामिल हो गई। कारण, उन्हें उस समय लोहिया के आदर्शो पर चलना था। हालांकि 2009 के लोकसभा चुनाव के समय उन्हें बाबा साहब अंबेडकर के सिद्धांत भाने लगे। इसलिए वह अब बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो चुकी हैं। रंजना बाजपेई एक समय इंदिरा गांधी की बेहद करीबी रही है। वह पूर्व केंद्रीय मंत्री राजेंद्र कुमारी बाजपेई की पुत्रवधू हैं।
[ममता बनर्जी]
ममता बनर्जी ने 1970 में कांग्रेस पार्टी के साथ अपने राजनीतिक सफर की शुरुआत की। 1997 में उन्होंने न केवल कांग्रेस पार्टी को छोड़ दिया, बल्कि एक नई पार्टी ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस भी बना ली। पार्टी छोड़ने की वजह वह पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और वामदलों में साठ-गांठ मानती हैं। ममता बनर्जी ने अपने अब तक के लोकसभा कार्यकाल के दौरान काफी कुछ ऐसा किया, जिससे वह काफी चर्चित हुई। उन्होंने 1996 में लोकसभा कार्यकाल के दौरान समाजवादी पार्टी सांसद अमर सिंह का कॉलर पकड़ लिया था। वहीं वर्ष 1997 में रेलवे बजट के दौरान रेल मंत्री रामविलास पासवान के ऊपर अपना शॉल फेंक दिया था। कारण, उनके अनुसार रामविलास ने पश्चिम बंगाल की पूरी तरह अनदेखी की। इसके अलावा, 1998 में वूमन रिजर्वेशन बिल का विरोध करने पर वे सपा सांसद दरोगा प्रसाद सरोज का कॉलर खींचती हुई संसद से बाहर ले गई। हाल ही में ममता ने कांग्रेस पार्टी के साथ चुनावी तालमेल किया है।
[नजमा हेपतुल्ला]
मौलाना अबुल कलाम आजाद ने भले ही देश के लिए पार्टी बदलना यानी मुस्लिम लीग में शामिल होना सही नहीं माना, लेकिन उनके परिवार की सदस्य नजमा हेपतुल्ला ने अपना रास्ता बनाने के लिए कांग्रेस छोड़कर बीजेपी का दामन थामने में बिल्कुल परहेज नहीं किया। वर्ष 1973 में उन्होंने कांग्रेस पार्टी से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की। 1980 में वे न केवल कांगेस पार्टी की सहायता से राज्यसभा सदस्य बनीं, बल्कि 1986 में इस पार्टी की महासचिव भी बन गई। वे 1985-1986 और फिर 1988 से लगातार 2004 तक राज्यसभा की उपसभापति बनी रहीं। फिर अचानक 2004 में नजमा कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में शामिल हो गयीं। अपने इस कदम के लिए नजमा ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को जिम्मेदार ठहराया। नजमा के अनुसार, उन्होंने कांग्रेस पार्टी के लिए बहुत-कुछ किया, लेकिन सोनिया गांधी ने इन सभी बातों को नजरअंदाज कर दिया। इसलिए वे बीजेपी में शामिल हो गई।
[जयाप्रदा]
जयाप्रदा का असली नाम ललिता रानी है। उनका जन्म आंध्रप्रदेश के राजामुंदरी में हुआ था। वह डॉक्टर बनना चाहती थीं। एक बार वह स्कूल फंक्शन के दौरान डांस कर रही थीं। उस समय उनकी उम्र मात्र चौदह वर्ष थी। उनके बेहतरीन डांस को देखकर एक तेलुगु फिल्म निर्माता ने उन्हें अपनी फिल्म में एक गाने में तीन मिनट का रोल दे दिया। फिल्मों में अपनी अदाओं से दर्शकों को लुभाने वाली जयाप्रदा ने 1994 में अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत तेलुगु देशम पार्टी से की। कुछ ही वर्षो बाद उनके और पार्टी सुप्रीमो चंद्रबाबू नायडू के रिश्तों में खटास आ गई। इसलिए वह दल-बदलकर समाजवादी पार्टी में शामिल हो गई।
Sunday, April 12, 2009
कहीं ग्रह न बिगाड़ दें कुर्सी का खेल
मतदाताओं का समर्थन पाने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे प्रत्याशी नामांकन का समय करीब आते ही ग्रहों का समर्थन हासिल करने की कोशिश में भी जुट गए हैं। अपने क्षेत्र के मतदाताओं को लुभाने में एक पल भी नहीं बर्बाद कर रहे ये उम्मीदवार अब पंडितों और ज्योतिषियों के लिए भी समय निकाल रहे हैं। दरअसल, अपनी जीत के लिए ये प्रत्याशी कोई 'रिस्क' लेना नहीं चाहते। इधर, पंडितों की मानें तो बुधवार का दिन नामांकन पत्र दाखिल करने के लिए सर्वश्रेष्ठ दिन है तो सोमवार के दिन का मुहूर्त भी 'ठीक-ठाक' है। हां, पंडितों ने शनिवार और मंगलवार को नामांकन न दाखिल करने की सलाह दी है।
नामांकन प्रक्रिया शनिवार 11 अप्रैल से शुरू हो रही है और शनिवार 18 अप्रैल तक चलेगी। इन आठ दिनों में 12 अप्रैल को रविवार और 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती की छुट्टी होने के कारण नामांकन नहीं भरे जा सकेंगे। यानि पर्चा दाखिल करने के लिए प्रत्याशियों को कुल छह दिन ही मिलेंगे। पंडितों के मुताबिक छह दिन की समयावधि में दो ही दिन श्रेष्ठ हैं। इन में पहला दिन है सोमवार और दूसरा दिन है बुधवार। जागरण से बातचीत में अखिल भारतीय ज्योतिष परिषद के राष्ट्रीय महासचिव आचार्य कृष्णदत्त शास्त्री ने बताया कि सोमवार को स्थिर लग्न है और पर्चा भरने के लिए 11 से 12 बजे तक का समय श्रेष्ठ है। इस लग्न एवं योग में प्रत्याशी को लोकप्रियता मिलती है। इसी तरह बुधवार का दिन भी नामांकन दाखिल करने के लिए काफी अच्छा दिन है। इस दिन 11.30 बजे से 12.12 बजे तक अभिजीत मुहूर्त है। यानी इस मुहूर्त में पर्चा दाखिल करने वालों को विजयश्री भी मिलेगी एवं उन लोगों का भी समर्थन मिल जाएगा, जिनसे मिलने में अभी संदेह लग रहा है।
आचार्य जी बताते हैं कि उनके पास ही दिल्ली एनसीआर के करीब 20 प्रत्याशी नामांकन के लिए शुभ मुहूर्त निकलवाने आ रहे हैं। उन्होंने सभी को उक्त दो दिनों में ही पर्चा भरने की सलाह दी है। इसके अलावा आचार्य जी यह भी बताते हैं कि शनिवार और मंगलवार के दिन नामांकन न ही किए जाएं तो बेहतर है, क्योंकि इन दोनों दिनों में निकृष्ट योग है और जीतना तो दूर की बात, इन में पर्चा भरने वाले प्रत्याशियों का पर्चा भी रद हो जाए तो बड़ी बात नहीं।
नामांकन प्रक्रिया शनिवार 11 अप्रैल से शुरू हो रही है और शनिवार 18 अप्रैल तक चलेगी। इन आठ दिनों में 12 अप्रैल को रविवार और 14 अप्रैल को अंबेडकर जयंती की छुट्टी होने के कारण नामांकन नहीं भरे जा सकेंगे। यानि पर्चा दाखिल करने के लिए प्रत्याशियों को कुल छह दिन ही मिलेंगे। पंडितों के मुताबिक छह दिन की समयावधि में दो ही दिन श्रेष्ठ हैं। इन में पहला दिन है सोमवार और दूसरा दिन है बुधवार। जागरण से बातचीत में अखिल भारतीय ज्योतिष परिषद के राष्ट्रीय महासचिव आचार्य कृष्णदत्त शास्त्री ने बताया कि सोमवार को स्थिर लग्न है और पर्चा भरने के लिए 11 से 12 बजे तक का समय श्रेष्ठ है। इस लग्न एवं योग में प्रत्याशी को लोकप्रियता मिलती है। इसी तरह बुधवार का दिन भी नामांकन दाखिल करने के लिए काफी अच्छा दिन है। इस दिन 11.30 बजे से 12.12 बजे तक अभिजीत मुहूर्त है। यानी इस मुहूर्त में पर्चा दाखिल करने वालों को विजयश्री भी मिलेगी एवं उन लोगों का भी समर्थन मिल जाएगा, जिनसे मिलने में अभी संदेह लग रहा है।
आचार्य जी बताते हैं कि उनके पास ही दिल्ली एनसीआर के करीब 20 प्रत्याशी नामांकन के लिए शुभ मुहूर्त निकलवाने आ रहे हैं। उन्होंने सभी को उक्त दो दिनों में ही पर्चा भरने की सलाह दी है। इसके अलावा आचार्य जी यह भी बताते हैं कि शनिवार और मंगलवार के दिन नामांकन न ही किए जाएं तो बेहतर है, क्योंकि इन दोनों दिनों में निकृष्ट योग है और जीतना तो दूर की बात, इन में पर्चा भरने वाले प्रत्याशियों का पर्चा भी रद हो जाए तो बड़ी बात नहीं।
नहीं मिल रहे जिंदाबाद करने वाले
पहले चुनावी मौसम में गली-गली में कार्यकर्ताओं की फौज घूमा करती थी। लेकिन इस चुनाव में प्रत्याशियों का हाथ-पैर कहे जाने वाले कार्यकर्ता आजकल ढूंढने से भी नहीं मिल रहे हैं। जिंदाबाद के नारों से आसमान गुंजा देने वाले कार्यकर्ताओं के बिना प्रत्याशी बेहद मायूस नजर आ रहे हैं। यही कारण है कि उम्मीदवार मतदाताओं से कहीं ज्यादा कार्यकर्ताओं को मनाने में जुटे हुए हैं। यही हाल कमोबेश दिल्ली से चुनाव लड़ रहे सभी प्रत्याशियों का है।
चुनाव के दिनों में कहीं जनसभा के लिए भीड़ एकत्रित करनी हो या फिर गली-मोहल्ले में घूम-घूमकर लोगों तक प्रत्याशियों का संदेश पहुंचाना हो, ये सारे काम कार्यकर्ताओं के जिम्मे होते थे। बदले में प्रत्याशी अपने कार्यकर्ताओं के मुंह से निकली हर मांग को पूरा करने की कोशिश करते थे। मगर अब नेता और कार्यकर्ताओं में वह रिश्ता ही नहीं पनप पाता है कि चुनावी बिगुल बजते ही वे अपने प्रत्याशी के समर्थन में मैदान में कूद पडें। अब तो सबकुछ अस्थायी है। चुनाव के बाद नेता कार्यकर्ताओं से पीछा छुड़ा लेते हैं। इसके अलावा जानकारों का कहना है कि चूंकि दिल्ली में अगले वर्ष राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन होना है, इस कारण जो लोग पहले बेरोजगार थे और चुनाव के दिनों में प्रत्याशियों के पीछे-पीछे नारे लगाते फिरते थे, वे अब विकास कार्यो में लगकर कमाई करने में जुटे हुए हैं। इस समय दिल्ली में खेल गांव, स्टेडियम, सड़कें, फ्लाईओवर, फ्लैट आदि खेल आयोजन से संबंधित कार्यो को निर्धारित अवधि में पूरा करने का दबाव है। इसके अलावा मेट्रो के विभिन्न लाइनों के विस्तार का काम दिल्ली व एनसीआर में चल रहा है। इस कारण एक खास तबके के लोग चुनावों में हिस्सा नहीं ले पा रहे हैं। निर्माण कार्य से जुड़ी तमाम कंपनियां ऐसे लोगों को मुंहमांगी वेतन दे रही हैं, ताकि निर्माण कार्य समय सीमा पर पूरा हो सके। वैसे भी चुनाव की सरगर्मी महज एक महीने की होती है, जबकि इन कार्यो में कम से कम डेढ़ से दो साल तक के लिए रोजगार मिला हुआ है।
जानकारों के अनुसार प्रत्याशियों को कार्यकर्ता न मिल पाने का एक दूसरा कारण भी है। राजनीतिक पार्टियों से जुड़े एक खास तबके के लोग चुनाव में अपने मनचाहे प्रत्याशी को टिकट न मिलने के कारण भी नाराज हैं। पार्टी ने जिस प्रत्याशी को टिकट दिया है, वह उन्हें वह थोपा हुआ उम्मीदवार लगता है। इसलिए वे काम के समय इधर-उधर खिसक जाते हैं। चांदनी चौक, नई दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली सीट पर चुनाव लड़ रहे भाजपा प्रत्याशियों के साथ ऐसा हो रहा है, वहीं कांग्रेस प्रत्याशी जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार का टिकट कटने से भी यह स्थिति उत्पन्न हो गई है। नतीजतन चुनाव मैदान में उतरे प्रत्याशियों का हाल यह है कि वे फिलहाल कार्यकर्ताओं का दिल जीतने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं।
चुनाव के दिनों में कहीं जनसभा के लिए भीड़ एकत्रित करनी हो या फिर गली-मोहल्ले में घूम-घूमकर लोगों तक प्रत्याशियों का संदेश पहुंचाना हो, ये सारे काम कार्यकर्ताओं के जिम्मे होते थे। बदले में प्रत्याशी अपने कार्यकर्ताओं के मुंह से निकली हर मांग को पूरा करने की कोशिश करते थे। मगर अब नेता और कार्यकर्ताओं में वह रिश्ता ही नहीं पनप पाता है कि चुनावी बिगुल बजते ही वे अपने प्रत्याशी के समर्थन में मैदान में कूद पडें। अब तो सबकुछ अस्थायी है। चुनाव के बाद नेता कार्यकर्ताओं से पीछा छुड़ा लेते हैं। इसके अलावा जानकारों का कहना है कि चूंकि दिल्ली में अगले वर्ष राष्ट्रमंडल खेलों का आयोजन होना है, इस कारण जो लोग पहले बेरोजगार थे और चुनाव के दिनों में प्रत्याशियों के पीछे-पीछे नारे लगाते फिरते थे, वे अब विकास कार्यो में लगकर कमाई करने में जुटे हुए हैं। इस समय दिल्ली में खेल गांव, स्टेडियम, सड़कें, फ्लाईओवर, फ्लैट आदि खेल आयोजन से संबंधित कार्यो को निर्धारित अवधि में पूरा करने का दबाव है। इसके अलावा मेट्रो के विभिन्न लाइनों के विस्तार का काम दिल्ली व एनसीआर में चल रहा है। इस कारण एक खास तबके के लोग चुनावों में हिस्सा नहीं ले पा रहे हैं। निर्माण कार्य से जुड़ी तमाम कंपनियां ऐसे लोगों को मुंहमांगी वेतन दे रही हैं, ताकि निर्माण कार्य समय सीमा पर पूरा हो सके। वैसे भी चुनाव की सरगर्मी महज एक महीने की होती है, जबकि इन कार्यो में कम से कम डेढ़ से दो साल तक के लिए रोजगार मिला हुआ है।
जानकारों के अनुसार प्रत्याशियों को कार्यकर्ता न मिल पाने का एक दूसरा कारण भी है। राजनीतिक पार्टियों से जुड़े एक खास तबके के लोग चुनाव में अपने मनचाहे प्रत्याशी को टिकट न मिलने के कारण भी नाराज हैं। पार्टी ने जिस प्रत्याशी को टिकट दिया है, वह उन्हें वह थोपा हुआ उम्मीदवार लगता है। इसलिए वे काम के समय इधर-उधर खिसक जाते हैं। चांदनी चौक, नई दिल्ली, पश्चिमी दिल्ली सीट पर चुनाव लड़ रहे भाजपा प्रत्याशियों के साथ ऐसा हो रहा है, वहीं कांग्रेस प्रत्याशी जगदीश टाइटलर और सज्जन कुमार का टिकट कटने से भी यह स्थिति उत्पन्न हो गई है। नतीजतन चुनाव मैदान में उतरे प्रत्याशियों का हाल यह है कि वे फिलहाल कार्यकर्ताओं का दिल जीतने के लिए दिन-रात एक किए हुए हैं।
Thursday, April 9, 2009
असली और नकली संवेदना
हमारे देश के 'युवराज' को राजमहल से निकलकर गरीबों और दलितों की झोपड़ियों में झांकने का बहुत शौक है। वह कभी किसी कलावती, कभी सरस्वती तो कभी सुनीता के घर जा धमकते हैं। उनका हाल-चाल पूछते हैं। कभी उनकी सूखी रोटी का एक कौर खा लेते हैं। उन्होंने दलित की झोपड़ी में रात भी बिताई। राजकुमार के ये प्रयोजन पूर्वनियोजित होते हैं। उनके साथ मीडिया का जमावड़ा होता है। थोड़ी दूर उनका काफिला भी खड़ा होता है। राजकुमार गरीबों की दुर्दशा पर आश्चर्य और शोक प्रकट करते हैं। इसके कारणों पर वह कभी चर्चा नहीं करते और न ही उन झोपड़ियों में रहने वाले गरीब दलितों को अपने राजमहल में आकर दावत खाने या रात बिताने का निमंत्रण देते हैं। आखिर वह ऐसा क्यों करते हैं? शायद उन्हें ढाई हजार साल पहले पैदा हुए कपिलवस्तु के राजकुमार सिद्धार्थ के प्रति गरीबों और शोषितों की असीम, अटूट आस्था के बारे में किसी ने बताया हो। शायद राजकुमार को लगता हो कि सिद्धार्थ की तरह वह भी देशवासियों के हृदय में हमेशा के लिए स्थान पा सकते हैं। सिद्धार्थ विभिन्न कलाओं में निपुण थे। ज्ञान-विज्ञान और दर्शन में भी उनकी गहरी रुचि थी। यशोदा से उनका विवाह हुआ और एक पुत्र का जन्म हुआ। सिद्धार्थ बेहद संवेदनशील थे। वह श्रमिकों-किसानों के हकों के बारे में चिंतित रहते। शिकार करने से मना कर देते कि व्यर्थ में किसी जानवर की जान लेना अनैतिक है। वह सोचते-आखिर हम प्राणियों के बीच अंतर क्यों करते हैं? कुछ लोगों से हम प्रेम करते हैं और कुछ से शत्रुता। अपने पुत्र के जन्म के बाद सिद्धार्थ के जीवन में एक निर्णायक घटना घटी। उनके पिता ने एक पड़ोसी राज्य पर हमला करने का फैसला किया। सिद्धार्थ ने यह कहकर इसका विरोध किया कि जब पड़ोसी देश की जनता की कोई गलती नहीं है तो हमला क्यों किया जा रहा है? सिद्धार्थ की बात नहीं मानी गई तो उन्होंने अपने परिवार और राज्य को त्यागकर वनवास ले लिया। ऋषि-मुनियों की संगत और कठिन साधना से उन्होंने मानव जीवन का सार समझने की कोशिश की। आखिर गया में एक बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें तत्वज्ञान की प्राप्ति हुई और वह सिद्धार्थ से बुद्ध बन गए।
बुद्ध ने समाज के पीड़ित और वंचित वर्ग के दु:ख-दर्द दूर करने की कोशिश की। बुद्ध की जीवन यात्रा और संयम व समानता के संदेश ने उन्हें करोड़ों लोगों का मसीहा बना दिया। उनके जितने अनुयायी भारत में हैं उससे कहीं ज्यादा विदेश में। जब डा. अंबेडकर ने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म को अपनाया तो उन्होंने कहा कि मुझे बौद्ध धर्म इसलिए सर्वश्रेष्ठ लगता है, क्योंकि यह तीन सिद्धांतों का मिश्रण है। बौद्ध धर्म समझदारी, करुणा और समानता का संदेश देता है। हमारे आज के युवराज गरीबों और दलितों के घरों में तो पहुंच जाते हैं, लेकिन उनकी दशा के लिए जिम्मेदार कारणों को समझने या उन्हें दूर करने का प्रयास नहीं करते। महाराष्ट्र की कलावती उन्हें बताती है कि पति के मरने के बाद उसे मुआवजे का पैसा नहीं मिल पाया। उसके घर में बिजली नहीं है। तेल की कुप्पी ही जलती है। उसे इतनी कम मजदूरी मिलती है कि वह अपने लड़के को पढ़ा नहींसकती। महाराष्ट्र में उन्हीं की पार्टी की सरकार है। अगर वह चाहते तो फोन पर मुख्यमंत्री को मुआवजा देने को कह सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वह सोच में पड़ गए। कई दिनों तक सोचते रहे। फिर अचानक संसद में भाषण देते समय वह कलावती की मुसीबत का हाल देश के सामने रख देते हैं-जब भारत-अमेरिका परमाणु करार हो जाएगा तो भारत के गांव-गांव में बिजली हो जाएगी और उस गरीब विधवा की झोपड़ी में उजाला हो जाएगा।
एक दिन वह अंग्रेज विदेश मंत्री के साथ अपने चुनाव क्षेत्र के गांव में दलित परिवार के साथ रात बिताने पहुंच जाते हैं। दोनों रात का खाना उस गरीब परिवार के साथ ही खाते हैं। अभावग्रस्त जीवन का स्वाद हर कौर के साथ उनके गले में भी उतरता है। सुबह दोनों बाहर निकलते हैं और इंतजार कर रहे पत्रकारों से मुखातिब होते हैं। राजकुमार उस परिवार की गरीबी पर अफसोस और आश्चर्य प्रकट करते हैं। अंग्रेज विदेश मंत्री भी कहते हैं कि भारत में गरीबी बहुत बड़ी समस्या है। ऐसा क्यों है, इस बारे में दोनों कुछ नहीं कहते। अगर ईमानदारी से इसके कारणों की पड़ताल करते तो उन्हें अपने पुरखों की नीतियों की आलोचना करनी पड़ती। लोग जानते हैं कि 2500 साल पहले वाले राजकुमार ने सच्चे दिल से काम किया था। उत्पीड़न और असमानता दूर करने के लिए राजमहल और परिवार हमेशा के लिए त्याग दिया था। वह आज भी उपेक्षितों और पीड़ितों के दिलों के राजकुमार हैं। हमारे आज के युवराज के निहितार्थ समाज कल्याण से नहीं, चुनाव कल्याण से जुड़े हैं।
बुद्ध ने समाज के पीड़ित और वंचित वर्ग के दु:ख-दर्द दूर करने की कोशिश की। बुद्ध की जीवन यात्रा और संयम व समानता के संदेश ने उन्हें करोड़ों लोगों का मसीहा बना दिया। उनके जितने अनुयायी भारत में हैं उससे कहीं ज्यादा विदेश में। जब डा. अंबेडकर ने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म को अपनाया तो उन्होंने कहा कि मुझे बौद्ध धर्म इसलिए सर्वश्रेष्ठ लगता है, क्योंकि यह तीन सिद्धांतों का मिश्रण है। बौद्ध धर्म समझदारी, करुणा और समानता का संदेश देता है। हमारे आज के युवराज गरीबों और दलितों के घरों में तो पहुंच जाते हैं, लेकिन उनकी दशा के लिए जिम्मेदार कारणों को समझने या उन्हें दूर करने का प्रयास नहीं करते। महाराष्ट्र की कलावती उन्हें बताती है कि पति के मरने के बाद उसे मुआवजे का पैसा नहीं मिल पाया। उसके घर में बिजली नहीं है। तेल की कुप्पी ही जलती है। उसे इतनी कम मजदूरी मिलती है कि वह अपने लड़के को पढ़ा नहींसकती। महाराष्ट्र में उन्हीं की पार्टी की सरकार है। अगर वह चाहते तो फोन पर मुख्यमंत्री को मुआवजा देने को कह सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। वह सोच में पड़ गए। कई दिनों तक सोचते रहे। फिर अचानक संसद में भाषण देते समय वह कलावती की मुसीबत का हाल देश के सामने रख देते हैं-जब भारत-अमेरिका परमाणु करार हो जाएगा तो भारत के गांव-गांव में बिजली हो जाएगी और उस गरीब विधवा की झोपड़ी में उजाला हो जाएगा।
एक दिन वह अंग्रेज विदेश मंत्री के साथ अपने चुनाव क्षेत्र के गांव में दलित परिवार के साथ रात बिताने पहुंच जाते हैं। दोनों रात का खाना उस गरीब परिवार के साथ ही खाते हैं। अभावग्रस्त जीवन का स्वाद हर कौर के साथ उनके गले में भी उतरता है। सुबह दोनों बाहर निकलते हैं और इंतजार कर रहे पत्रकारों से मुखातिब होते हैं। राजकुमार उस परिवार की गरीबी पर अफसोस और आश्चर्य प्रकट करते हैं। अंग्रेज विदेश मंत्री भी कहते हैं कि भारत में गरीबी बहुत बड़ी समस्या है। ऐसा क्यों है, इस बारे में दोनों कुछ नहीं कहते। अगर ईमानदारी से इसके कारणों की पड़ताल करते तो उन्हें अपने पुरखों की नीतियों की आलोचना करनी पड़ती। लोग जानते हैं कि 2500 साल पहले वाले राजकुमार ने सच्चे दिल से काम किया था। उत्पीड़न और असमानता दूर करने के लिए राजमहल और परिवार हमेशा के लिए त्याग दिया था। वह आज भी उपेक्षितों और पीड़ितों के दिलों के राजकुमार हैं। हमारे आज के युवराज के निहितार्थ समाज कल्याण से नहीं, चुनाव कल्याण से जुड़े हैं।
Tuesday, April 7, 2009
अब नेताजी के काफिले में होगी कारों की भरमार
लोकसभा चुनाव में नामांकन के लिए जाते वक्त लंबी-चौड़ी कार रैली निकालने की हसरत रखने वाले नेताओं की मुश्किल चुनाव आयोग ने आसान कर दी है। दिल्ली चुनाव आयोग ने प्रत्याशियों को विशेष छूट देते हुए ऐलान किया है कि वे चुनाव प्रचार के दौरान मनमानी संख्या में कारों का इस्तेमाल कर सकते हैं। चुनाव आयोग के इस फैसले से बहुत से नेताओं की बांछें खिल गई हैं।
इस बार चुनाव आयोग कार्यालय द्वारा जारी सर्कुलर के माध्यम से सभी अधिकारियों को सूचना दी गई है कि इस बार लोकसभा चुनाव लड़ने वाले सभी प्रत्याशियों को चुनाव प्रचार के लिए मनचाही संख्या में कारों के इस्तेमाल की छूट रहेगी। इस बार किसी भी प्रत्याशी को चुनाव प्रचार में गाड़ी लगाने के लिए अलग से अनुमति पत्र नहीं लेना होगा। इस बार चुनाव प्रचार में प्रत्याशी चाहें कितनी भी संख्या में गाड़ियों का प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन उन्हें प्रत्येक गाड़ी के बारे में सूचना एवं उसका नंबर क्षेत्र के चुनाव अधिकारी कार्यालय में दर्ज करवाना होगा।
बिना विवरण वाली गाड़ी से प्रचार होने पर संबंधित प्रत्याशी के खिलाफ चुनावी आचार संहिता के उल्लंघन का मामला दर्ज कर उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
पूर्वी दिल्ली के चुनाव अधिकारी ने बताया कि प्रत्याशियों द्वारा चुनाव प्रचार में लगाई गई गाडि़यों की वीडियोग्राफी कराई जाएगी। यह काम आब्जर्वर टीमें करेंगी। ताकि प्रत्याशियों के चुनाव खर्चे पर नजर रखी जा सके और यह भी पता लगाया जा सके कि प्रत्याशियों द्वारा जमा कराया गया चुनाव खर्च का विवरण सही है या नहीं।
उल्लेखनीय है कि पिछले लोकसभा चुनाव में प्रत्येक प्रत्याशी को चुनाव प्रचार में केवल तीन गाडि़यों के इस्तेमाल की स्वतंत्रता थी। विधानसभा चुनाव में प्रत्येक प्रत्याशी को चुनाव प्रचार के लिए पांच गाडि़यों के इस्तेमाल की स्वतंत्रता दी गई थी। संख्या लोकसभा चुनाव में यह संख्या अनलिमिटेड कर दी गई है।
इस बार चुनाव आयोग कार्यालय द्वारा जारी सर्कुलर के माध्यम से सभी अधिकारियों को सूचना दी गई है कि इस बार लोकसभा चुनाव लड़ने वाले सभी प्रत्याशियों को चुनाव प्रचार के लिए मनचाही संख्या में कारों के इस्तेमाल की छूट रहेगी। इस बार किसी भी प्रत्याशी को चुनाव प्रचार में गाड़ी लगाने के लिए अलग से अनुमति पत्र नहीं लेना होगा। इस बार चुनाव प्रचार में प्रत्याशी चाहें कितनी भी संख्या में गाड़ियों का प्रयोग कर सकते हैं, लेकिन उन्हें प्रत्येक गाड़ी के बारे में सूचना एवं उसका नंबर क्षेत्र के चुनाव अधिकारी कार्यालय में दर्ज करवाना होगा।
बिना विवरण वाली गाड़ी से प्रचार होने पर संबंधित प्रत्याशी के खिलाफ चुनावी आचार संहिता के उल्लंघन का मामला दर्ज कर उचित कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
पूर्वी दिल्ली के चुनाव अधिकारी ने बताया कि प्रत्याशियों द्वारा चुनाव प्रचार में लगाई गई गाडि़यों की वीडियोग्राफी कराई जाएगी। यह काम आब्जर्वर टीमें करेंगी। ताकि प्रत्याशियों के चुनाव खर्चे पर नजर रखी जा सके और यह भी पता लगाया जा सके कि प्रत्याशियों द्वारा जमा कराया गया चुनाव खर्च का विवरण सही है या नहीं।
उल्लेखनीय है कि पिछले लोकसभा चुनाव में प्रत्येक प्रत्याशी को चुनाव प्रचार में केवल तीन गाडि़यों के इस्तेमाल की स्वतंत्रता थी। विधानसभा चुनाव में प्रत्येक प्रत्याशी को चुनाव प्रचार के लिए पांच गाडि़यों के इस्तेमाल की स्वतंत्रता दी गई थी। संख्या लोकसभा चुनाव में यह संख्या अनलिमिटेड कर दी गई है।
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